{"title":"Hindi Classics","description":"","products":[{"product_id":"निर्मला","title":"Nirmala (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 को बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उन्होंने मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधओं के बीच जन-जीवन को बहुत ही गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें एक महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n इस उपन्यास में समाज के उस तबके का चित्रण किया गया है जहाँ साधनों के अभाव में लड़की की शादी उससे दुगनी उम्र के लड़के के साथ कर दी जाती है और लड़की सब कुछ अपना भाग्य समझकर चुपचाप सब सह लेती है। परंतु इतने पर भी सब ठीक नहीं रहता है और उसे अपनी गरीबी का देश झेलना पड़ता है। इसमें निर्मला भी एक ऐसी ही लड़की है जो सुखी-सम्पन्न घर में जन्म लेती है और पिता की अकस्मात् मृत्यु के बाद रूढ़िवादी परम्परा का शिकार हो जाती है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e184\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778311318,"sku":"MP804","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/nirmalahindi.jpg?v=1678772714"},{"product_id":"गोदान","title":"Godan (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n यह उपन्यास प्रेमचंद की महान रचना है, जिसमें भारत के किसानों की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही भारतीय किसान के लिये उनके पशु के महत्त्व को शब्दों द्वारा चित्रित किया गया है। गरीब किसान जो महाजनों के कर्ज और लगान में दबकर जीने को मजबूर हैं, परंतु वह हिम्मत नहीं हारता है। उसकी पत्नी धनिया उन सारी व्यवस्थाओं के खिलाफ बार-बार आवाज उठाती है। होरी एक जोड़ा बैल खरीदता है पर उसका भाई उसे ज़हर देकर मार डालता है, जिसके कारण होरी का पूरा परिवार तबाह हो जाता है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e392\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778344086,"sku":"MP411","price":221.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350336625.jpg?v=1625256989"},{"product_id":"कर्मभूमि","title":"Karmbhumi - Karmabhoomi - Premchand (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n इस उपन्यास में अमरकान्त की सच्ची देशभक्ति से उसके परिवार का हृदय परिवर्तन हो जाता है और वे स्वतंत्रता संग्राम में उसका साथ देने को तैयार हो जाते हैं। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने भारतीय नारी की सम्पूर्ण दुविधा पर प्रकाश डाला है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e280\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778409622,"sku":"MP412","price":225.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350336595.jpg?v=1625259707"},{"product_id":"वरदान","title":"Vardaan - Premchand","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n यह उपन्यास प्रेमचंद द्वारा लिखित एक लोकप्रिय उपन्यास है। विरजन एक सुंदर युवती है जो अपने माता-पिता के असामयिक मृत्यु के कारण अपने मुंहबोले चाचा-चाची के घर में रहने लगती है। बचपन से एकसाथ रहने के कारण मुंहबोला भाई प्रताप उससे प्रेम करने लगता है। परंतु विरजन को इस भाव का पता नहीं चल पाता है और उसकी शादी किसी अच्छे घर में हो जाती है। विरजन का पति कमला जो एक रसिक और विलासी पुरुष है, सुंदरता पर मोहित हो जाता है परंतु एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है। बाद में जब विरजन को पता चलता है प्रताप उससे प्रेम करता था तब उसे दुःख होता है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of 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को चित्रित किया है वह आज भी उसी प्रकार समाज में फलीभूत है और शायद भविष्य में भी बना रहेगा। \n जो लोग दिखावे को पसंद करते हैं और शादी-विवाह पर अपनी हैसियत से अधिक खर्च करते हैं तथा खुद को धनी दिखाने की कोशिश में कर्ज में धंसते चले जाते हैं, उनका सारा जीवन उस कर्ज को चुकाने में गुजरता है। इसी कारण वे कई बार गलत काम तक करने को मजबूर हो जाते है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e360\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778475158,"sku":"MP414","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350336564.jpg?v=1625257461"},{"product_id":"31-सर्वश्रेष्ठ-कहानियां-प्रेमचंद","title":"31 Sarvshreshth Kahaniya (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 को बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। मध्यम वर्ग परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को बहुत ही गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें एक महान उपन्यासकार , कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n इस कथा-संग्रह में प्रेमचंद ने समाज व्यवस्था, धर्म, जाति तथा ठेठ देहाती जीवन का वर्णन किया है। ‘दो बैलों की कथा’ कहानी में भारतीय समाज में पशु की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है। ‘ईदगाह’ कहानी में एक मासूम बच्चा जो मेले देखने के लिए मिले पैसे से अपनी मां को चिमटा खरीद कर देता है। ‘पूस की रात’ कहानी में एक गरीब किसान जो पूस की रात (ठंड मौसम) में कम्बल के अभाव में खेत की रखवाली करने पर मजबूर है, पर उसके खेत को नील गाय नष्ट कर देती हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e288\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778507926,"sku":"MP838","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350336601.jpg?v=1625124075"},{"product_id":"21-अनमोल-कहानियां-प्रेमचंद","title":"21 Anmol Kahaniya (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n इस कथा-संग्रह में प्रेमचंद ने समाज व्यवस्था, धर्म, जाति तथा ठेठ देहाती जीवन का चित्रण किया है। ‘बूढ़ी काकी’ कहानी में बूढ़ी औरत की अपने ही घर में अवहेलना की जाती है। ‘कफन’ कहानी में पत्नी के कफन के लिये इकट्ठे किये हुए पैसे से उसका पति शराब पीकर खुद को गौरवान्वित महसूस करता है। ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी में छूआ-छूत के कारण ठाकुर अपने कुएं से एक प्यासी औरत को पानी नहीं लेने देता और उसका पति भी नाले का पानी पीने पर मजबूर है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ 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तथा अधिकार की प्रधानता पर जोर दिया गया है। स्त्री की विवशता और दुर्दशा को भी उजागर किया गया है। एक ओर जहाँ नौकरशाह अपनी सत्ता के मद में चूर होकर गरीब जनता पर अत्याचार करते हैं ; वहीं दूसरी ओर सत्य, निष्ठा और अहिंसा को समाज के एक दबे-कुचले व्यक्ति द्वारा मजबूती प्रदान की है।\n  यह उपन्यास ‘रंगभूमि’ परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े हुए भारत की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक समस्याओं से परिपूर्ण है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e600\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778606230,"sku":"MP852","price":315.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350337288.jpg?v=1625230920"},{"product_id":"41-अनमोल-कहानियां-प्रेमचंद","title":"41 Anmol Kahaniya (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया। इस कथा-संग्रह में प्रेमचंद ने सामाजिक व्यवस्था, धर्म, जाति तथा ठेठ देहाती जीवन का शब्द चित्रण किया है। प्रेमचंद की लगभग सभी रचनाओं में भारतीय गांव की मिट्टी की खुशबू आती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e376\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778638998,"sku":"MP853","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350337318.jpg?v=1625124108"},{"product_id":"प्रतिज्ञा","title":"Pratigya (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच \n जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार , कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n प्रतिज्ञा प्रेमचंद द्वारा लिखित एक अद्वितीय उपन्यास है। जिसमें प्रेमचंद ने आदर्श हिन्दू नारी की वास्तविक छवि उकेरी है। अमृतराय इसके मुख्य नायक हैं। प्रेमा अमृतराय से प्रेम करती है; परंतु सामाजिक मर्यादा के कारण अपने प्रेम को अमृतराय ठुकरा देते हैं। मन-ही-मन अमृतराय आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा लेते हैं। पूर्णा एक विधवा स्त्री है जिसके द्वारा प्रेमचंद ने विधवा की मर्म स्थिति को शब्द-चित्रित किया है। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने भारतीय नारी की सम्पूर्ण दुविधा पर प्रकाश डाला है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of 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था।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHINDI\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e424\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778704534,"sku":"MP1037","price":293.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350338964.jpg?v=1625237531"},{"product_id":"कफ़न-एवं-अन्य-कहानियां","title":"Kafan (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n प्रेमचंद ने इस कथा-संग्रह में स्वाभिमानी जीवन, समाज-व्यवस्था, धर्म एवं जाति का चित्रण किया है। ‘कफ़न’ कहानी प्रेमचंद की उस समय के गरीब परिवेश के जीवन यापन की सच्चाईयों से हमें सराबोर करती है और द्रवित भी करती हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e144\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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आएंगी।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e152\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778770070,"sku":"MP1285","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/eidgah.jpg?v=1683541008"},{"product_id":"संग्राम","title":"Sangram (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को उन्होंने बहुत ही गहराई से देखा। अपना जीवन उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n प्रस्तुत नाटक द्वारा प्रेमचंद ने ग्रामीण किसान के संघर्ष को दर्शाया है जिसमें वो अपने मान-सम्मान की ख़ातिर समाज से विमुख होकर भी अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने का अथक प्रयास करता है। प्रस्तुत नाटक द्वारा प्रेमचंद ने सामाजिक कुरीतियों पर एक गहरी चोट की है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e200\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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छाप छोड़ जाते हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e96\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778901142,"sku":"MP1364","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/001111.jpg?v=1750506328"},{"product_id":"बेटों-वाली-विधवा-अवं-अन्य-कहानियां","title":"Beton Wali Vidhwa (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 में बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उन्होंने मध्यम परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को बहुत ही गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें एक महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया।\n  ‘बेटों वाली विधवा एवं अन्य कहानियां’ प्रेमचंद का यह कहानी संग्रह पाठक को समाज के विभिन्न रसों की अनुभूति कराता है; चाहे वह अभागी माँ का अलगाव हो, या गुल्ली डण्डा खेल की बचपन की स्मृति, या शास्त्री जी का मोटर के छींटे के प्रति विद्रोह। ऐसे ही और रोचक कहानियां इस संकलन को और भी मर्मस्पर्शी एवं मनोरंजक बनाते हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e224\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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अमृतराय एक विधवा से विवाह कर समाज के सामने एक नयी रीति को उजागर करते हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e132\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145778999446,"sku":"MP1417","price":99.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/prema.jpg?v=1684744000"},{"product_id":"सेवासदन","title":"Sevasadan (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम धनपत राय था। मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 को बनारस के पास लमही नामक गांव में हुआ था। उन्होंने मध्यम वर्ग परिवार में जन्म लेने के कारण अभाव और असुविधाओं के बीच जन-जीवन को बहुत ही गहराई से देखा और अपना जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उन्हें एक महान उपन्यासकार, कथाकार और बहुत सी उपाधियों से सम्मानित किया गया। 8 अक्टूबर सन् 1936 को मुंशी जी का बीमारी के कारण निधन हो गया। प्रेमचंद द्वारा रचित ‘सेवासदन’ उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय है। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने नायिका सुमन द्वारा दहेज-प्रथा, बेमेल विवाह, वेश्यागमन जैसी सामाजिक कुरीतियों से जूझ रही महिलाओं एवं उनके संघर्ष को उजागर किया है। सुमन का यही संघर्ष अंत में सेवासदन को समर्पित होते हुए स्त्री-समाज के लिए प्रेरणा स्वरूप सिद्ध होता है जो कि इस उपन्यास को महाउपन्यास का दर्जा दिलाता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e264\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e144\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145779097750,"sku":"MP1458","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/priyakahaniyaapremchand.jpg?v=1655464442"},{"product_id":"मानसरोवर-प्रेमचंद","title":"Mansarovar Part 1 (Hindi) - Premchand","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eप्रेमचंद विरचित ‘मानसरोवर’ उनके द्वारा लिखी हुई कथाओं का संग्रह है। वे हिन्दी साहित्य के जाने माने कथाकार हैं। दूसरे शब्दों में हिंदी साहित्य के कथाकारों में उनका स्थान शीर्ष पर है।\n मुंशी प्रेमचंद का जन्म बनारस के पास एक गरीब परिवार में हुआ था। अभावग्रस्त जीवन जीने के कारण उन्होंने समाज के विभिन्न पहलुओं को बहुत करीब से देखा और भोगा था। उनके जीवन पर इसकी बहुत ही गहरी छाप पड़ी। वही छाप उनकी लेखनी के द्वारा कथाओं में प्रस्फुटित हुई। ‘ईदगाह’, ‘बेटों वाली विधवा’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘पूस की रात’ आदि कहानियां ज्चलंत उदाहरण हैं।\n भाषा सरल और व्यावहारिक होने के कारण कथाएं आकर्षित करती हैं ; समझने में सरल है- यही उनकी लोकप्रियता का कारण है। यथार्थ चित्रण ने कथाओं को मर्मस्पर्शी बना दिया है जो कि पाठकों को प्रभावित करती हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e336\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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हो गया।\n प्रेमचंद ने इस उपन्यास में धर्म को अहम भूमिका दी है, और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को उल्लेखनीय रूप से चित्रित किया है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e160\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145779622038,"sku":"MP1549","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789389643879.jpg?v=1625263921"},{"product_id":"लघु-कथाएँ-प्रसिद्ध-हिंदी-लेखक-प्रेमचंद-शरत-चंद्र-जयशंकर-प्रसाद-रवींद्रनाथ-टैगोर","title":"Short Stories - Famous Hindi Writers (Premchand, Sharat Chandra, Jaishankar Prasad, Rabindranath Tagore)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003e‘प्रसिद्ध साहित्यकारों की अनमोल कहानियां’का यह संग्रह प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे भारतीय सुप्रसिद्ध साहित्यकारों की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से चयनित कहानियों से तैयार किया गया है। जिसे पढ़कर समस्त पाठकगण मनुष्य की विभिन्न परिस्थितियों की अनुभूति कर सकते है। ये समस्त लेखकगण अपनी-अपनी रचनाओं द्वारा समाज में विशेष रूप में विख्यात हैं। इनके लेखन आगामी पीढ़ी पर गहराई तक प्रभाव छोड़ती है। जहाँ प्रेमचंद एवं जयशंकर प्रसाद की कहानियों द्वारा समाज के अभिन्न रूप का वर्णन होता है जो की प्रतीकात्मक, भावात्मक एवं आदर्शों से परिपूर्ण हैं वहीं रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाएं बांग्ला भाषा की प्रस्तुति द्वारा अत्यंत लोकप्रिय हैं। इनकी रचनाएं अन्य भाषाओं में भी प्रस्तुत हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003ePremchand, Sharat Chandra Cahttopadhuay, Jaishankar Prasad, Rabindranath Tagore\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge 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में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। रवीन्द्रनाथ टैगोर का 7 अगस्त 1941 ई. को देहान्त हो गया था। गीतांजलि बांग्ला भाषा में लिखी गई थी, जिसका बाद में अंग्रेजी, हिन्दी सहित और कई भाषाओं में अनुवाद किया गया। गीतांजलि शब्द गीत और अंजलि को मिलाकर बना है जिसका अर्थ-गीतों का उपहार है। यह काव्य प्रकृति प्रेम, ईश्वर के प्रति निष्ठा और मानवतावादी मूल्यों के प्रति समर्पित भाव से संपन्न है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eRabindranath Tagore\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e168\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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किया गया है। जिसमें पाषाणी, अवगुंठन, भिखारिन, अपरिचिता, समाज का शिकार, अनाथ एवं अन्य कहानियां सर्वश्रेष्ठ हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eRabindranath Tagore\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e224\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780113558,"sku":"MP835","price":162.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350336892.jpg?v=1625230715"},{"product_id":"नाव-दुर्घटना","title":"Naav Durghatna (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eरवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, सन् 1861 ई. को हुआ था। रवीन्द्रनाथ टैगोर को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। वे विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उनकी दो रचनाएं दो देशों की राष्ट्रगान बनी-भारत का राष्ट्रगान \"जन गण मन” और बांग्लादेश का “आमार शोनार बाग्ंला।“ गीतांजलि उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। इसके लिए उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। रवीन्द्रनाथ टैगोर का 7 अगस्त 1941 ई. को देहान्त हो गया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर का उपन्यास ‘नाव दुर्घटना’ प्यार, घृणा, ईष्र्या-द्वेष तथा कर्तव्य-अकर्तव्य के बीच झूलते उन पात्रों की कहानी है जो नियति के इशारों पर नाचते थक रहे हैं, टूट रहे हैं, लड़ रहे हैं उन परिस्थितियों से जीतने की चाह में।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eRabindranath Tagore\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e176\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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तालापद, पोस्टमास्टर और शिव पंडित जैसे पात्रों के माध्यम से जीवन की विविध् जटिलता को जीवंत रूप से प्रस्तुत किया है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eRabindranath Tagore\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e112\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780211862,"sku":"MP1582","price":112.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/ANMOL.jpg?v=1750506473"},{"product_id":"गोरा","title":"Gora (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eरवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, सन् 1861 ई. को हुआ था। रवीन्द्रनाथ टैगोर को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। वे विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उनकी दो रचनाएं दो देशों की राष्ट्रगान बनी-भारत का राष्ट्रगान \"जन गण मन” और बांग्लादेश का “आमार शोनार बाग्ंला।“ गीतांजलि उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। इसके लिए उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। रवीन्द्रनाथ टैगोर का 7 अगस्त 1941 ई. को देहान्त हो गया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह उपन्यास, गोरा और सुचरिता तथा बिनॉय और लोलिता की प्रेम कहानियों के माध्यम से तत्कालीन धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं तथा रीति-रिवाजों में स्थित असमानता और रुढ़िवादिता को दर्शाता है। ब्रिटिश शासन काल में, बंगाल की पृष्ठभूमि में ‘गोरा’ भारत के राष्ट्रवादी चेतना की जागृति को भी दर्शाता है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eRabindranath Tagore\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of 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मृणालिनी पर कई बार अविश्वास पैदा होता है, परंतु मृणालिनी बार-बार उसे अपने प्रेम का विश्वास दिलाती है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eBankimchandra Chattopadhayay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e104\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780277398,"sku":"MP862","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350337431.jpg?v=1625231736"},{"product_id":"देवी-चौधरानी","title":"Devi Chaudhrani (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eबंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म सन् 1838 को एक खुशहाल बंगाली परिवार में हुआ था। वे बांग्ला भाषा के प्रख्यात उपन्यासकार एवं कवि थे। बंकिमचन्द्र ने भारतीय मानवीय भावों को सहज शब्दों में दर्शाया है। धर्म, समाज, जाति एवं राजनीति के मुद्दों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है, भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार इनकी रचनाओं में अपनी छवि को देखता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के लिए ये प्रेरणास्रोत थे। बंकिमचन्द्र ने ‘देवी चौधरानी’ उपन्यास में भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा को जीवंत रूप दिया है। प्रफुल्ल एक गरीब लड़की है, जिसका विवाह सुखी-सम्पन्न परिवार में होता है। परंतु गरीबी के कारण उसे घर से निकाल दिया जाता है। इसके बाद वो पूरी कहानी में संघर्ष करती नजर आती है। इस कहानी में स्त्री के मजबूत इरादों को सुंदर तरीके से उकेरा गया है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eBankimchandra Chattopadhayay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e168\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780310166,"sku":"MP859","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/9789388304498.MAIN.jpg?v=1708144024"},{"product_id":"आनंदमठ","title":"Anandmath (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eबंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म सन् 1838 को एक खुशहाल बंगाली परिवार में हुआ था। वे बांग्ला भाषा के प्रख्यात उपन्यासकार एवं कवि थे। बंकिमचन्द्र ने भारतीय मानवीय भावों को सहज शब्दों में दर्शाया है। धर्म, समाज, जाति एवं राजनीति के मुद्दों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है, भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार इनकी रचनाओं में अपनी छवि को देखता है। भारतीय स्वतंत्राता संग्राम वेफ क्रांतिकारियों के लिए ये प्रेरणास्रोत थे। ‘आनंदमठ’ बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध उपन्यास है। 18 वीं शताब्दी में बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि में लिखित, यह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ संन्यासी विद्रोह को दर्शाता है। यह पुस्तक ‘स्वतंत्राता’ के लिए भारत के संघर्ष का पर्याय है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eBankimchandra Chattopadhayay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e120\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780375702,"sku":"MP1506","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/Untiy.jpg?v=1730781678"},{"product_id":"कपालकुंडला","title":"Kapalkundala (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eबंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म सन् 1838 को एक खुशहाल बंगाली परिवार में हुआ था। वे बांग्ला भाषा के प्रख्यात उपन्यासकार एवं कवि थे। बंकिमचन्द्र ने भारतीय मानवीय भावों को सहज शब्दों में दर्शाया है। धर्म, समाज, जाति एवं राजनीति के मुद्दों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है, भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार इनकी रचनाओं में अपनी छवि को देखता है। भारतीय स्वतंत्राता संग्राम के क्रांतिकारियों के लिए ये प्रेरणास्रोत थे। कपालकुंडला 1866 में प्रकाशित हुआ यह उपन्यास सबसे बेहतरीन और सबसे लोकप्रिय है। यह उपन्यास दरियापुर, कोंताई में सेट किया गया है, जहाँ बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने डिप्टी कलेक्टर के रूप में काम किया था। यह उपन्यास कपालकुंडला नाम की एक वनवासी लड़की के जीवन के बारे में है, जिसे सप्तग्राम के एक युवा नबकुमार के साथ प्यार हो जाता है, पर वह शहर के जीवन के साथ समायोजित करने में असमर्थ होती है। यह उपन्यास कई भाषाओ में प्रकाशित हुआ है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eBankim Chandra Chattopadhyay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e112\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780408470,"sku":"MP1727","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789390602148.jpg?v=1625261434"},{"product_id":"चंद्रकांता","title":"Chandrakanta (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eदेवकीनंदन खत्री एक प्रमुख भारतीय लेखक थे जिन्होंने हिंदी साहित्य में कालातीत कालजयी योगदान दिया है। उनका जन्म 1861 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पूसा में हुआ था। उनके पिता लाला ईश्वरदास थे। देवकीनंदन खत्री की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और फारसी भाषा में हुई थी। बाद में उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत का अध्ययन किया। उन्होंने अपना पहला उपन्यास, चंद्रकांता, छब्बीस साल की उम्र में लिखा था। उनकी कुछ अन्य लोकप्रिय रचनाओं में भूतनाथ, काजर की कोठरी और बीरेंद्र वीर शामिल हैं। देवकीनंदन खत्री ने मूल रूप से धारावाहिक प्रकाशन के लिए अपना उपन्यास चंद्रकांता लिखा था। जब इसे एक किताब में एकत्र किया गया, तो यह आधुनिक हिंदी गद्य का अब तक का सबसे लंबा गद्य बन गया। विजयगढ़ राज्य की राजकुमारी चंद्रकांता विवाह योग्य उम्र की है, लेकिन क्या वह अपने प्रेमी, पड़ोसी नौगढ़ के वीरेंद्र सिंह से शादी करेंगी, या वह प्रधन मंत्री के बेटे कृर सिंह से शादी करने के लिए मजबूर होगी?\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eDevaki Nandan Khatri\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e272\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780506774,"sku":"MP1730","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789390602124.jpg?v=1625256544"},{"product_id":"हिंद-स्वराज","title":"Hind Swaraj (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eबापू के नाम से लोकप्रिय मोहन दास करमचंद गाँधी भारत के स्वतंत्राता संग्राम के नायक थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशक में, भारत की स्थिति और संघर्ष के विषय में, गाँधी जी ने अपने विचारों को ‘हिन्द स्वराज’ नामक पुस्तक में अभिव्यक्त किया था। यह पुस्तक गाँधी जी और उनके नजदीकी मित्र प्राणजीवन मेहता के मध्य हुए वार्तालाप पर आधारित है। पुस्तक में लिपिबद्ध उनके विचारों के आदान-प्रदान के विषय मुख्यतः समकालीन सभ्यता, भारत और इंग्लैंड की स्थिति, सत्याग्रह और शिक्षा थे। अंग्रेजी शासन और पाश्चात्य सभ्यता की दासता से मुक्त होकर भारत स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त करेगा ऐसा आत्मविश्वास जागृत करने तथा भारतीयों का मनोबल बढ़ाने में 1909 में प्रकाशित ‘हिन्द स्वराज’ ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eMahatma Gandhi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e88\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780539542,"sku":"MP1785","price":86.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789390602742.jpg?v=1625221740"},{"product_id":"देवांगना","title":"Devangana (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eआचार्य चतुरसेन शास्त्री हिंदी साहित्य के एक प्रमुख लेखक थे। उनका जन्म 26 अगस्त 1891 को भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बुलंदशहर जिले के एक गाँव औरंगाबाद चंडोक में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित केवाल राम ठाकुर और माता नन्हीं देवी थीं। आचार्य जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सिकंद्राबाद के एक स्कूल में की। फिर उन्होंने राजस्थान के जयपुर के संस्कृत कॉलेज में दाखिला लिया। यहाँ से उन्होंने आयुर्वेद की उपाधि सस्कृत में वर्ष 1915 में प्राप्त की। उनका साहित्यिक उत्पादन हिंदी साहित्य में अप्रतिम है। उन्होंने 72 प्रकाशित पुस्तकें लिखीं।\n देवांगना एक ऐतिहासिक उपन्यास है। यह बौद्ध मठों में उत्पन्न कमियों को दिखाता है जिसके कारण भारत से बौद्ध धर्म का पूर्ण उन्मूलन हुआ। इस कहानी के माध्यम से, लेखक ने अपने अनूठे आख्यान के साथ धर्म के पाखंड को बहुत जटिल रूप से प्रस्तुत किया है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eAcharya Chatursen\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e120\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780605078,"sku":"MP1736","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/devangna.jpg?v=1685182580"},{"product_id":"कंकाल","title":"Kankal (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eजयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी सन् 1890 में काशी के सरायगोवर्धन में हुआ था। प्रसाद जी की प्रारम्भिक शिक्षा काशी में हुई जिसके बाद उनकी शिक्षा का प्रबंध् घर पर ही किया गया जहाँ उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू तथा फारसी का अध्ययन किया। उन्हें हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार और बहुत सी उपाधियों के साथ सम्मानित किया गया। 15 नवम्बर 1937 में उनका क्षय रोग के कारण काशी में निधन हो गया। यह उपन्यास जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित हिन्दी के सभी उपन्यासों में अत्यधिक लोकप्रिय है। यह उपन्यास नागरिक सभ्यता का अंतर यथार्थ प्रस्तुत करता है। प्रसाद जी ने कंकाल द्वारा समाज के जिस रूप को प्रस्तुत किया है वह आज भी समाज में फलीभूत है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e216\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780637846,"sku":"MP1276","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789388304078.jpg?v=1625261537"},{"product_id":"कामायनी","title":"Kamayani (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eजयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी सन् 1890 में काशी के सराय गोवर्धनन में हुआ था। प्रसाद जी की प्रारम्भिक शिक्षा काशी में हुई जिसके बाद उनकी शिक्षा का प्रबंध् घर पर ही किया गया जहाँ उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू तथा फारसी का अध्ययन किया। उन्हें हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार और बहुत सी उपाधियों के साथ सम्मानित किया गया। 15 नवम्बर 1937 में उनका क्षय रोग के कारण काशी में निधन हो गया। प्रस्तुत महाकाव्य ‘कामायनी’ द्वारा प्रसाद जी ने वैदिक कथाओं का अनुसरण कर छायावाद युग में प्रलय के बाद मनु और श्रद्धा का विवरण कर चिंता से आनंद तक मनुष्य के समस्त भावों का जिक्र किया है। ‘कामायनी’ को तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ के बाद दूसरा महाकाव्य माना जाता है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e136\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780670614,"sku":"MP1355","price":113.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789388304771.jpg?v=1625258562"},{"product_id":"तितली","title":"Titli (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eजयशंकर प्रसाद का जन्म वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। प्रसाद जी ने अपनी रचनाओं में ग्राम, नगर, प्रकृति और जीवन का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है जो भावुकता और कवित्व से परिपूर्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिन्दी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पंत, महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। प्रस्तुत उपन्यास ‘तितली’ प्रसाद जी की दूसरी सर्वश्रेष्ठ रचना है। प्रस्तुत उपन्यास द्वारा प्रसाद जी ने कृषि परम्परा एवं ग्रामीण जीवन में किसानों द्वारा जूझती हुई समस्याओं को उजागर किया है। ग्रामीण जीवन जी रही तितली का संघर्ष इस उपन्यास को और भी मर्मस्पर्शी बना देता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e200\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e232\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780736150,"sku":"MP1476","price":184.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/sarvshreshthkahaniyaa-jaishankar.jpg?v=1651743036"},{"product_id":"चंद्रगुप्त","title":"Chandragupt (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eजयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी सन् 1890 में काशी के सराय गोवर्धन में हुआ था। प्रसाद जी की प्रारम्भिक शिक्षा काशी में हुई जिसके बाद उनकी शिक्षा का प्रबंध घर पर ही किया गया जहाँ उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू तथा फारसी का अध्ययन किया। उन्हें हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार और बहुत सी उपाधियों के साथ सम्मानित किया गया। 15 नवम्बर 1937 में उनका क्षय रोग के कारण काशी में निधन हो गया।\n यह नाटक मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के उत्थान की और महाशक्तिशाली मगध के राजा धनानन्द के पतन की कथा हैं। यह चाणक्य के प्रतिशोध और विश्वास की कहानी भी है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e160\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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सार्वजनिक क्षेत्र में उसकी बड़ी सफलता के साथ जोड़ने में मदद करता है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e136\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780801686,"sku":"MP1337","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/skandgupt.jpg?v=1651744374"},{"product_id":"अजातशत्रु","title":"Ajatshatru (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eजयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी सन् 1890 में काशी के सराय गोवर्धन में हुआ था। प्रसाद जी की प्रारम्भिक शिक्षा काशी में हुई जिसके बाद उनकी शिक्षा का प्रबंध घर पर ही किया गया जहाँ उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू तथा फारसी का अध्ययन किया। उन्हें हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार और बहुत सी उपाधियों के साथ सम्मानित किया गया। 15 नवम्बर 1937 में उनका क्षय रोग के कारण काशी में निधन हो गया।\n अजातशत्रु उत्तर भारत के इतिहास काल के प्रथम सम्राट बिंबसार के पुत्र के बारे में है। वे अपने प्रारंभिक जीवन में बहुत ही हिंसक, और अविनीत रहे, पर बाद के जीवन में वे एक साहसी, कार्यकुशल एवं व्यवहार पाटु शासक कहलाए। यह नाटक हर भारतीय पाठक के लिए उपयोगी, पठनीय एवं संग्रहणीय है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eJaishankar Prasad\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e112\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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ने महिलाओं एवं समाज के नज़रिए को प्रस्तुत किया है जिसमें महिलाएं अपने विविध व्यक्तित्व, शक्ति, एवं अन्य विवरणों द्वारा अपने जीवन के आधार स्वरूप में मुख्य पात्रता प्रस्तुत करती हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eSaadat Hasan Manto\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e200\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145780932758,"sku":"MP1308","price":162.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/21anmolkahaniyaa-manto.jpg?v=1685182705"},{"product_id":"25-सर्वश्रेष्ठ-कहानियां-मंटो","title":"25 Sarvshreshth Kahaniya (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eसआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई सन् 1912 में पंजाब के लुधियाना जिले में समराला के पपरौड़ी गांव में हुआ था। अलीगढ़ से शिक्षा प्राप्त की और अपनी प्रस्तुतियों द्वारा उन्हें 20वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध उर्दू लेखक, उपन्यासकार एवं नाटककार के रूप में नवाजा गया। 18 जनवरी सन् 1955 में उनका निधन हो गया।\n प्रस्तुत कहानियों में मंटो ने 1947 में देश का बंटवारा होने के कारण समाज में उत्पन्न पागलपन, क्रूरता एवं दहशतनुमा प्रभाव को विभिन्न कहानियों द्वारा प्रस्तुत किया है जो कि हमें उस समय का अहसास कराती हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eSaadat Hasan Manto\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e240\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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प्रस्तुत करता यह उपन्यास मानवीय रिश्तों की नाजुकता और जीवन की विलक्षणता की भावनाओं के बवंडर को पेश करता है जिसमें पाठक अपने आप को डूबता हुआ पायेंगे।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eSaratchandra Chattopadhyay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e320\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145781031062,"sku":"MP1036","price":212.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/files\/23658_9.jpg?v=1750506400"},{"product_id":"अनमोल-कहानियां-शरतचंद्र-चट्टोपाध्याय","title":"Anmol Kahaniya - Sharat Chandra (Hindi)","description":"\u003cp style=\"text-align: justify;\"\u003eशरत्चंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल साहित्य जगत के एक सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। उनकी अधिकतर रचनाओं को हिंदी में व्यापक रूप से अनुवाद किया गया है। उनका जन्म 15 सितंबर 1876 को हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ था। रवींद्रनाथ टैगोर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का शरत्चंद्र के जीवन पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा।\n उन्होंने बहुत कम उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था। उनकी लिखावट में संजीदगी झलकती है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eSaratchandra Chattopadhyay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e160\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default 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है।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eSaratchandra Chattopadhyay\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eAge Group\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e15+ Years\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguage\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003eHindi\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages\u003c\/b\u003e\u003cbr\u003e168\u003c\/p\u003e","brand":"Maple Press","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":40145781162134,"sku":"MP982","price":158.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/products\/9789350337684.jpg?v=1625225976"}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0571\/8976\/1174\/collections\/4-2.jpg?v=1628144206","url":"https:\/\/www.maplepress.co.in\/collections\/hindi-classics.oembed?constraint=hindi","provider":"Maple Press","version":"1.0","type":"link"}